भोपाल। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कैंपा फंड से लेग्जरी वाहन खरीदी पर रोक लगा दी है, लेकिन रेंजरों को कम दर पर गाड़ी किराया से लेने की छूट दी है। मंत्रालय ने मध्य प्रदेश वन विभाग को चार सौ गाडि़यां किराया पर लेने के अनुमति दी गई है।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने यह साफ कर दिया है कि महंगी गाडिय़ां अगर किराए भी ली जाती हैं तो उनका भुगतान रोक दिया जाएगा। इसका बिल संबंधित अधिकारियों को ही देना पड़ेगा। अगर भुगतान किया जाता है, तो भुगतान करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी।
कैंपा फंड से वन विभाग न तो नई गाडिय़ां खरीद सकेगा और ना ही विदेश यात्राएं कर सकेगा।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कैंपा यानि कम्पलसरी एफारेस्टोरेशन मैनेजमेंट एण्ड प्लानिंग अथॉरिटी के तहत बनाई गई नियमावली का ड्राप्ट भी जारी कर दिया है। ड्राफ्ट के अनुसार अब कैंपा फंड केवल वन एवं वन्य प्राणियों के विकास पर ही खर्च किया जा सकेगा। वन भूमि के इस्तेमाल के बदले मुआवजे के तौर पर जो धनराशि वन विभाग को मिलती है, वो भारत सरकार में कैंपा फंड में जमा होती है।
प्रदेश का अकेले इस फंड में 2006-07 से लेकर अब तक करीब 5000 करोड़ रूपए जमा है। जिसका प्रति वर्ष चार से 500 व्याज बनता है। इसके अनुसार ही कैंपा फंड से प्रदेश को राशि जारी की जाती है। वन विभाग ने इस वर्ष करीब पांच सौ करोड़ रूपए की वार्षिक कार्ययोजना केन्द्र सरकार के पास भेजा है।
गौरतलब है कि इस धनराशि के खर्च के लिए कोई ठोस गाइड लाइन न होने के चलते बीते सालों में इसका बड़े पैमाने पर गैर-वानिकी कार्यों में उपयोग किया जाता रहा है। वन विभाग इससे लग्जरी गाडिय़ां, आफिस में एसी, कूलर, पंंखे आफिस के रख-रखाव जैसे अन्य कार्यों में कैंपा की राशि से खर्च करते रहते थे। इससे चिंतित भारत सरकार ने वर्ष 2016 में कैंपा एक्ट बनाने पर विचार किया था।
इसके लिए सभी राज्यों से सुझाव बुलाने और उन पर विचार करने के बाद वन एवं पर्यावरण मंत्रलाय ने एडवाइजरी जारी की। कैंपा नियमावली के अनुसार अब इस निधि की 80 प्रतिशत राशि का उपयोग वनों एवं वन्य प्राणियों के विकास में होगा, शेष 20 प्रतिशत राशि का उपयोग अन्य कर्यों में किया जाएगा।
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