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Saturday, June 8, 2019

राजधानी में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के लिए यह पांच कारण हैं जिम्मेदार

भोपाल@देवेंद्र शर्मा की रिपोर्ट...

आखिर राजधानी का पारा क्यों चढ़ा है? 46 डिग्री पर पहुंचे पारे के कारणों की पड़ताल करने की कोशिश में तमाम तरह के चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कलियासोत से कोलार तक के जंगल में एक हजार हेक्टेयर की कमी से लेकर सुंदरता के नाम पर करीब 100 वर्ग किमी के क्षेत्र को पूरी तरह से सीमेंट कांक्रीट में बदल दिया गया।

इतना ही नहीं, शहर के एक तरफा विस्तार में बीते पंद्रह साल के दौरान 1500 हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि पर पक्के निर्माण हो गए। हैरत तो ये कि तपिश को सोखने के लिए बीते सालों में कोई नया मैदान विकसित नहीं किया गया। इतना ही नहीं, शहर के छोटे बड़े करीब 1500 पार्क का भी 30 फीसदी से अधिक हिस्सा पक्का कर दिया गया।

ये अब भी जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पक्के स्थान धूप को तुरंत रिफ्लेक्ट करते हैं जिससे वातावरण में तेजी से गर्माहट बढ़ती है। पारा चढऩे में इसकी बड़ी भूमिका है।

 

 

greenery

यह हैं प्रमुख कारण

1. एक हजार हेक्टेयर जंगल ही खत्म कर दिया
कलियासोत से केरवा तक करीब सात हजार हेक्टेयर का शहर किनारे ग्रीन स्पेस था। 1986 में इस क्षेत्र के विकास का जिम्मा सीपीए फोरेस्ट को सौंपा गया। चंदनपुरा, छावनी, चीचली, बैरागढ़, मेंडोरा, मेंडोरी, दौलतपुरा समेत करीब एक दर्जन गांव यहां आते हैं। साल दर साल यहां स्कूल, कॉलेज, हॉस्पीटल व भवन निर्माण के साथ फॉर्म हाउस बना लिए गए। करीब एक हजार हेक्टेयर जमीन रसूखदारों ने कब्जे में कर ली, यहां से हरियाली खत्म हो गई।

 

2. सीमेंटेड बाजार, धूप में दहकते हैं

2006 में एमपी नगर में सीमेंट कांक्रीट की मोटी परत चढ़ाकर इसे सीमेंटेड बाजार बना दिया। बाद में दस नंबर, न्यू मार्केट के साथ पुराने शहर के बाजारों में भी ऐसा ही किया। हालात ये हैं कि एमपी नगर में भूजल 600 फीट से नीचे हैं। इससे कम गहराई के बोरिंग पूरी तरह बंद हो गए। सुबह ही यहां दोपहर का अनुभव होता है। सबसे अधिक पारा यहीं का है।

 

3. 1200 किमी की सीमेंटेड सडक़ें, खेल मैदान एक भी नहीं

शहर में पक्की सडक़ों की लंबाई साढ़े चार हजार किमी के करीब है। पंद्रह साल में करीब 1200 किमी की सडक़ें नई बनी। शहर विस्तार के लिए जरूरी था, लेकिन हैरत ये हैं कि इन सालों में शहर में एक भी खेल मैदान विकसित नहीं हुआ। एक्सपट्र्स का कहना है कि सडक़ें जरूरी हैं, लेकिन ओपन स्पेस और मैदान भी जरूरी हैं। गर्मी-बारिश में से संतुलन बनाए रखते हैं।

 

4. एक लाख नए मकान, 300 अवैध कॉलोनियां, पार्क की जमीन पर भी निर्माण

भोपाल मास्टर प्लान के लिए किए सर्वे को आधार माने तो शहर में बीते पंद्रह साल में एक लाख से अधिक पक्के मकान बने हैंं। करीब 300 अवैध कॉलोनियां विकसित हुई। हैरत ये हैं कि यहां नए पार्क नहीं बने। आबादी के हिसाब से क्षेत्र में पार्क के लिए जो जगह तय करना थी, वहां भी मकान बनाकर बेच दिए गए। यदि इमानदारी से कॉलोनियां विकसित होती तो शहर में अभी 1300 से अधिक नए पार्क बन चुके होते। गर्मी से राहत में ये मदद करते।


5. तालाबों में निर्माण
शहर में 13 तालाब है। इनमें से तीन तालाब तो अपना अस्तित्व खो चुके हैं। बचे हुए की भी स्थिति ठीक नहीं है। मैनिट की एक रिपोर्ट के अनुसार बड़ा तालाब खुद 19 फीसदी तक अतिक्रमण की चपेट में है। नवाब सिद्कि हसन मोतिया तालाब पूरी तरह आवासीय कॉलोनियां बन गई। बड़े जलस्त्रोत जिस गर्मी को समाहित कर लेते थे, वहां बीते सालों में सीमेंट कांक्रीट के निर्माण हो गए।

 

आगे और बिगड़ेगी स्थिति

- लिंक रोड पर सुभाष स्कूल से नूतन कॉलेज तक स्मार्टसिटी ने सैंकड़ों छोटे पौधों को उखाड़ा। कच्ची जमीन पर सीमेंट कांक्रीटीकरण किया। यहां लोहे के दिखावटी पौधे रोपे। विदेशी घास लगाई। सुंदरता के नाम पर पूरी हरियाली खत्म कर दी।
- एमपी नगर में एकमात्र हराभरा क्षेत्र बापू की कुटिया के सामने वाला बचा था। यहां मल्टीलेवल पार्किंग का प्रोजेक्ट लाए और किनारे के करीब 150 पेड़ जिसमें आम, नीम, बरगद, पीपल जैसे पेड़ थे, काट दिए।

- टीटी नगर में स्मार्टसिटी विकसित की जा रही है और यहां 12 हजार पुराने बड़े पेड़ काटे जा रहे हैं। काम अभी जारी है आगामी समय में ये भी पूरा क्षेत्र सीमेंट कांक्रीट का ही जंगल बनेगा।
- कोलार रोड का चौड़ीकरण किया, लेकिन इसके किनारे बचे हुए स्थान पर कोई पौधरोपण नहीं किया। स्थिति ये कि गर्मी में लोगों को राहत के लिए कोई छाया नहीं है।

 

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
नागालैंड और मणिपुर के पूर्व राज्यपाल ओएन श्रीवास्तव ने अपने घर को हरियाली के दम पर ऐसा बना दिया कि उन्हें गर्मी में एसी तो दूर कूलर का भी इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। वे बताते हैं कि हरियाली की चादर ही भोपाल को भीषण गर्मी से बचा सकती है। जो भी खाली स्थान हैं वहां पर अलग-अलग किस्मों के पौधे रोपे जाने चाहिए।

विकास कार्यों के लिए भी यदि पेड़ काटे जाते हैं तो उसके बदले वहीं आसपास ही दो से तीन गुने पेड़ लगाए जाने चाहिए। कितना भी सीमेंट-कांक्रीट के जंगल खड़े कर लें लेकिन इनके बीच में कच्चे और खुले स्थान भी जरूर हों ताकि उससे पानी जमीन में जा सके और वहां पेड़ भी लग सकें।



from Patrika : India's Leading Hindi News Portal http://bit.ly/2WTjDiN

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